रानी रामपाल ने बढ़ाया देश का मान, हॉकी के बाद अब फोर्ब्स इंडिया मैगजीन के कवर पेज पर छाई
 

टोक्यो ओलिंपिक में भाारतीय महिला हाकी टीम को मजबूत स्थान तक ले जाने वाली कप्तान रानी रामपाल ने सशक्‍त महिलाओं की सूची में जगह बनाई है। फोर्ब्स इंडिया मैगजीन ने ये सूची जारी की है। रानी रामपाल ने मैगजीन के कवर में जगह हासिल की। रानी के शक्तिशाली महिलाओं की फोर्ब्स की सूची में शामिल होने पर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के लोग उत्साहित हैं।

जानिये रानी रामपाल के संघर्ष की कहानी

हरियाणा के शाहबाद मारकंडा की रहने वाली रानी को आज देश ही नहीं पूरी दुनिया पहचानती है। रानी रामपाल ने रातों रात इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। इसके लिए उन्होंने सालों तक  पसीना बहाया है। उनके पिता घोड़ा गाड़ी चलाने का काम करते थे।वे दिन में मुश्किल से 100 रुपए तक कमा पाते थे। 

रानी जब 6 से 7 साल की हुईं, तो उन्हें मैदान में दूसरे बच्चों को देखने के बाद हॉकी खेलने का शौक हुआ। उन्होंने अपने पिता से हॉकी खेलने की इच्छा व्यक्त की, उन्होंने भी अपनी तकलीफों को पीछे छोड़ते हुए बेटी के सपनों पर ध्यान देना शुरू किया। रानी रामपाल ने बताया था कि उन्हे मैदान पर एक टूटी हुई हॉकी स्टिक मिली थी, जिसके साथ  ही अभ्यास करना शुरू किया। लगातार मेहनत के दम पर रानी ने यह मुकाम हासिल किया है।

भारतीय महिला हाकी टीम ने टोक्यो ओलिंपिक में इतिहास रचा था। टीम ने ओलिंपिक में पहली बार सेमीफाइनल में जगह बनाई थी। टीम ने क्वार्टर फाइनल में आस्ट्रेलिया को 1-0 से हराकर पूरे विश्व के हाकी प्रेमियों काे अपनी तरफ खींचा था। बतौर कप्तान रानी रामपाल का इसमें विशेष योगदान रहा है।

पिता घोड़ा बुग्गी में छोड़कर आते थे

रानी रामपाल आज इस स्थान पर ऐसे ही नहीं पहुंची। इसके लिए संघर्ष करना पड़ा। उसके पिता रामपाल उसको घोड़ा बुग्गी से उसको हाकी के मैदान तक छोड़कर आते थे। पिता ने अपना काम छोड़ा, लेकिन कभी भी रानी की प्रेक्टिस को मिस नहीं होने दिया गया। रानी ने भी कोच बलदेेव सिंह की देखरेख में मैदान पर जमकर पसीना बहाया। उसने अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपने भाई की शादी के दिन भी प्रेक्टिस नहीं छोड़ी। वह 15 साल की उम्र में 2010 विश्वकप के लिए राष्ट्रीय टीम में सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बनी। वर्ल्ड गेम्स एथलीट आफ द ईयर उनके नाम है।

संघर्ष से लड़कर आगे बढ़ीं रानी

रानी रामपाल के परिवार की हालात तंग थी। वह स्कर्ट की बजाय सूट सलवार पहनकर खेलती थी। परिवार को भी यही चिंता थी कि उनकी लड़की को खेलते समय शॉर्ट स्कर्ट पहननी होगी। सौभाग्य से, उसके माता-पिता ने सामाजिक दबाव को छोड़ दिया और अपनी बेटी को उसके सपने का पीछा करने दिया। घर में घड़ी न होने पर मां आसमान के तारे देखकर उसको उठाती थी। उसको प्रेक्टिस के समय अपने लिए 300 एमएल दूध लाना होता था, लेकिन वह 200 ग्राम ही ला पाती थी। वह दूध पूरा करने के लिए इसमें बाकी मात्रा में पानी मिला लेती थी।

आज की बात करें तो रानी  रामपाल देश की सर्वश्रेष्ठ महिला हॉकी खिलाड़ी और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं। रानी रामपाल आज इसका श्रेय अपने कोच बलदेव सिंह को देती हैं।

हाल ही में मिला पदमश्री पुरस्कार

रानी रामपाल को हाल ही में पदमश्री पुरस्कार मिला है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने उनको सम्मानित किया। रानी रामपाल को इससे पहले भी कई अवार्ड मिल चुके हैं। उन्होंने बताया कि पदमश्री या दूसरे पुरस्कार मिलने पर किसी भी खिलाड़ी या व्यक्ति की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उनकी भी जिम्मेदारी बढ़ गई है। वह अब हाकी को और ऊंचाइयों तक लेकर जाएंगी।