राजनीति

ये है आया राम गया राम के जनक गयालाल की पूरी कहानी?

Navdeep Setia
23 Sep 2022 8:04 AM GMT
ये है आया राम गया राम के जनक गयालाल की पूरी कहानी?
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आया राम गया राम की कहावत का जन्म हरियाणा में ही हुआ। इस कहावत को जन्म दिया गयालाल ने। हस्सनपुर से पहली बार साल 1967 में गयालाल विधायक चुने गए थे। 9 घंटे में तीन बार दल बदला।

आया राम गया राम की कहावत का जन्म हरियाणा में ही हुआ। इस कहावत को जन्म दिया गयालाल ने। हस्सनपुर से पहली बार साल 1967 में गयालाल विधायक चुने गए थे। 9 घंटे में तीन बार दल बदला। संयुक्त मोर्चा के नेता राव बीरेंद्र ङ्क्षसह गयालाल को लेकर चंडीगढ़ में मीडिया के सामने हाजिर हुए।

राव बोले गयाराम अब आयाराम है। यह कहावत पांच दशक पुरानी है। इससे हम सभी वाकिफक हैं। पर इस कहावत के जनक गयालाल की कहानी कहीं न कहीं हरियाणा की सियासत से गायब है। गयालाल ने कुल चार चुनाव लड़े। दो बार जीत दर्ज की। हर बार दल बदलकर चुनाव लड़ा। आयाराम गयाराम की सियासत के जनक की पूरी कहानी पर एक नजर:

गया का जन्म पलवल जिला के होडल कस्बे में 15 जनवरी 1930 को हुआ। मिडल तक पढ़ाई की। अपने शुरूआती जीवन में ही गयालाल ने सामाजिक और सियासी गतिविधियों में शिरकत शुरू कर दी। 1955 में वे नगरपार्षद चुने गए। लगातार बीस साल तक होडल नगरपालिका के उपाध्यक्ष रहे।

1967 में वे मनुष्य कल्याण धर्म समाज बामनखेड़ा के प्रधान बने। भारतीय दलित वर्ग संघ पलवल के अलावा भारतीय क्रांति दल हसनपुर विधानसभा क्षेत्र के अध्यक्ष रहे। वंचितों व दलितों के हकों को लेकर आवाज उठाते रहे। 1967 में गयालाल ने हस्सनपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा।

10 हजार 458 वोट हुए गयालाल ने बतौर आजाद उम्मीदवार करीब 360 वोटों से जीत दर्ज की। हरियाणा गठन के बाद हुए इस पहले ही चुनाव में गयालाल सहित 16 आजाद विधायक चुने गए थे जो आज भी एक रिकॉर्ड है। उस समय कुल 81 विधानसभा क्षेत्र थे। 48 पर कांग्रेस को जीत मिली। भारतीय जनसंघ के 12 विधायक तो स्वतंत्र पार्टी के तीन विधायक चुने गए।

मार्च 1967 में भगवत दयाल शर्मा मुख्यमंत्री बन गए। इसके कुछ समय बाद ही शर्मा का ङ्क्षसहासन डोलने लगा। राव बीरेंद्र ङ्क्षसह अंदरखाते कांग्रेस के विधायकों को तोड़ रहे थे। राव बीरेंद्र सिंह कांग्रेस से बागी होकर संयुक्त मोर्चे की अगुवाई कर रहे थे। इसी बीच गयालाल नाम का शख्स हरियाणा ही नहीं देश की राजनीति में चर्चा में आ जाता है।

गयालाल पहले कांग्रेस के साथ हो जाते हैं। कुछ घंटे बाद वे संयुक्त मोर्चा में आ जाते हैं। फिर पाला बदलते हैं। 9 घंटे के भीतर तीन बार दल-बदल करते हैं। जब फिर से संयुक्त मोर्चा में आते हैं तब चंडीगढ़ में राव बीरेंद्र सिंह गयालाल को मीडिया के सामने लाते हुए कहते हैं गयाराम अब आयाराम हैं। तभी से हरियाणा में दल-बदल का खेल शुरू हुआ जो आज तक जारी है।

आयाराम-गयाराम की कहावत ने भी तभी जन्म लिया। लोकसभा में भी यह मुद्दा खूब उछला। अकेले गयालाल ही नहीं हरियाणा में सियासत का एक लम्बा दल-बदल का खेल बाद में भी देखने को मिला। 1967 में गयालाल सहित करीब 20 से अधिक विधायकों ने 40 बार दल-बदल किया।

1979 में भजनलाल ने जनता पार्टी के 40 विधायक अपने पाले में कर देवीलाल की सरकार गिरा दी। 1991 में हविपा के चार विधायक कांग्रेस में चले गए। 1999 में ओमप्रकाश चौटाला ने हविपा के 22 विधायकों को अपने साथ मिलाकर इनैलो की सरकार बनाई। 2009 में भी हजकां के 5 विधायकों ने दल-बदल किया। खैर 1967 में 9 घंटे में रिकॉर्ड तीन बार दल बदलने वाली गयालाल की कहानी अभी बाकी है।

गयालाल ने जहां आयाराम गयाराम की सियासत को जन्म दिया, वहीं उन्होंने अपनी सियासी जीवन में कुल 4 चुनाव लड़े और हर बार अलग दल से। 1967 में आजाद विधायक चुने गए। 1972 में अखिल भारतीय आर्य सभा से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के बिहारी लाल से 2677 वोटों से हार गए।

1977 में जनता पार्टी की टिकट पर कांग्रेस के छोटेलाल को करीब 17 हजार मतों से पराजित किया। 1982 में बतौर आजाद उम्मीदवार लोकदल के गिरीराज किशोर से लगभग 6500 वोटों से हार गए। गयालाल ने अपने जीवन में कांग्रेस के खिलाफ संघर्ष करने वाले भारतीय क्रांति दल के लिए खूब काम किया था।

6 अप्रैल 1975 को गयालाल ने दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक बड़ा जलसा किया जिसमें हरियाणा, राजस्थान, उतरप्रदेश और दिल्ली के लोगों ने शिरकत की। एक विधायक के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र में काम भी किए। पर गयालाल को एक विधायक के तौर पर जानने की बजाय लोग आज भी उन्हें दल-बदल की सियासत के जनक के रूप में याद करते हैं।

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