जानें क्या है 'स्पिंड विवाह' जिस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने लगाई रोक? यहां जानें पूरी खबर

 दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्वजों या 'सपिंड' विवाह से संबंधित व्यक्तियों के बीच विवाह पर रोक लगाने वाले हिंदू विवाह अधिनियम के एक प्रावधान की वैधता को बरकरार रखा है।
 
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्वजों या 'सपिंड' विवाह से संबंधित व्यक्तियों के बीच विवाह पर रोक लगाने वाले हिंदू विवाह अधिनियम के एक प्रावधान की वैधता को बरकरार रखा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मनमीत पीएस अरोड़ा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह में अनियमित विकल्प अनैतिक संबंधों को वैध बना सकते हैं और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 (बी) को चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं है, जो बीच विवाह पर रोक लगाती है। सपिंड (रिश्तेदार) जब तक कि प्रत्येक पक्ष को नियंत्रित करने वाली प्रथा या प्रथा ऐसे मिलन की अनुमति नहीं देती।

याचिका खारिज

दरअसल, एक महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि उस व्यक्ति से शादी जो उसका जीजा है, कानून के तहत अमान्य घोषित किया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने महिला की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि यह समुदाय में सपिंड विवाह की अनुमति देने वाली एक वैध परंपरा के अस्तित्व को साबित करने में विफल रही है।

ये बात कोर्ट ने कही

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने मामले के तथ्यों में इस प्रथा के अस्तित्व को साबित करने में विफल रही और उसने माता-पिता की अनुमति पर भरोसा किया, जो प्रथा की जगह नहीं ले सकती। इसलिए, इस न्यायालय के पास हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(v) को चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं है।