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कभी पत्नी की सेलरी पर चलता था घर, आज उधार लेकर खड़ा किया करोड़ों का कारोबार
 

Businessman Sanjeev Bikhchandani Success Story

आज हम आपको उस कंपनी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने भारत में करोड़ों युवाओं की जिंदगी में क्रांति ला दी है। इस कंपनी ने दो बेहद मुश्किल काम को चुटकीबजाने जितना आसान कर दिया है। वे दोनों कठिन कार्य हैं- बेहतर जिंदगी के लिए अच्छी नौकरी खोजना और शादी के लिए जीवनसाथी खोजना।

इन दोनों काम को आसान बनाया है इंफोएज़ (Info Edge) ने। साफ शब्दों में कहे तो हम बात कर रहे हैं नौकरी डॉट कॉम (Naukari.com) और जीवनसाथी डॉट कॉम (Jeevansathi.com) के बारे में। दरअसल, ये दोनों पोर्टल इंफोएज़ के ही प्रॉडक्ट हैं।


 

कुछ बड़ा करने का था सपना-

इस कंपनी को बनाने वाले शख्स का नाम है संजीव बिकचंदानी। उन्हें 2020 में पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। संजीव बिकचंदानी जब पढ़ाई कर रहे थे, तो उन्हें लगता था कि कुछ बड़ा करना चाहिए।

वो चाहते थे कि कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद कुछ समय तक नौकरी करनी है और फिर कुछ बड़ा काम करना है। लेकिन क्या करना है? इसके बारे में उनके पास कोई आइडिया नहीं था।

सालभर की नौकरी के बाद एक दिन संजीव बिकचंदानी ने मन बनाया और नौकरी छोड़ दी। साल था 1990. यही साल था जब इंफोएज़ की स्थापना हुई।

पत्नी की सैलरी से चलाया खर्च-

नौकरी के दौरान उन्हें 8 हजार रुपये महीना मिलते थे लेकिन 1990 में 8000 रुपये महीना कम नहीं था। लेकिन कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। उन्होंने नौकरी छोड़ने से पहले अपनी पत्नी सुरभि से बात की और कहा- अब आपकी सैलरी से ही घर का खर्च चलेगा, क्योंकि मैं नौकरी छोड़कर अपना काम करने वाला हूं।

सुरभि ने भी संजीव का साथ दिया क्योंकि वे चाहती थीं कि वे अपना बिजनेस शुरू करें।
 

रखी दो कंपनियों की नींव-

संजीव बिकचंदानी अपने घर में नौकर के कमरे से काम शुरू किया, जिसके लिए वे अपने पिता को किराया भी देते थे। 1990 में उन्होंने अपने एक मित्र के साथ दो कंपनियों की नींव रखी। एक का नाम था इंडमार्क (Indmark) और दूसरी इंफोएज़ (Info Edge)

तीन साल साथ काम करने के बाद 1993 में दोनों पार्टनर अलग हो गए. संजीव बिकचंदानी के हिस्से में आई इंफोएज़। इंफोएज़ का मुख्य काम था सेलरी से संबंधित सर्वे करना।

इंफोएज़ ने शुरुआत में सर्वे किया कि एंट्री लेवल पर MBAs और इंजीनियर्स को कौन-सी कंपनी कितना पैसा देती है। वे इस तरह की विस्तृत रिपोर्ट बनाते थे और अलग-अलग कंपनियों को बेचते थे।

नौकर के कमरे में लौटना पड़ा-

दोनों पार्टनर्स के अलग होने के बाद संजीव बिकचंदानी को अपने उसी कमरे में लौटना पड़ा, जहां से उन्होंने अपना काम शुरू किया था।

अपने खर्च पूरे करने के लिए उन्होंने एक कंपनी में कंसल्टिंग एडिटर की नौकरी कर ली. यहां उन्होंने लगभग 4 साल बिताए।


 

कहां से मिला naukari.com का आइडिया-
1996 में दिल्ली में आईटी एशिया एग्जिबिशन चल रही थी। संजीव वहां पहुंचे। उनकी नज़र एक स्टॉल पर पड़ी, जहां लिखा था WWWसंजीव के पूछने पर विक्रेता ने बताया कि ई-मेल क्या है और इसका इस्तेमाल कैसे होता है। इसके बाद उसने इंटरनेट पर कुछ ब्राउज़ करके भी दिखाया कि कैसे दुनियाभर की कई जानकारियां इंटरनेट पर पाई जा सकती हैं।

बस! यही वो मौका था, जो संजीव बिकचंदानी के दिमाग में आइडिया क्लिक कर गया। संजीव को याद था कि जब वे HMM में नौकरी कर रहे थे, तब लोग क्लासीफाइड विज्ञापनों के किस कद्र शौकीन थे।


अब उन्होंने भारत से दो और लोगों को कंपनी का शेयर देकर अपने साथ जोड़ा और नौकरी.कॉम की शुरुआत कर दी।