संसद में कैसे वापस होंगे कृषि कानून ? जानें क्या है इसकी वैधानिक प्रक्रिया
 

केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में कृषि कानून वापस लेने के प्रस्ताव पर मुहर लग चुकी है। तो वहीं अब संसद में आगे की कार्यवाही पूरी की जाएगी। जानकारों की मानें तो संसद सत्र शुरू होने के बाद कम से कम 3 दिन में ये प्रक्रिया पूरी हो सकती है। संसद सत्र 29 नवंबर से शुरू होना है। इस दौरान कानून वापसी की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। तो चलिए आपको बताते हैं कि, कोई भी कानून कैसे वापस होता है।

किसी भी कानून को वापस करने के दो तरीके हैं। पहला अध्यादेश और दूसरा संसद से बिल पारित कराना। अगर किसी कानून को वापस लेने के लिए अध्यादेश लाया जाता है तो उसे छह महीने के भीतर फिर से संसद से पारित कराना होगा। यदि किसी कारणवश अध्यादेश संसद द्वारा छह महीने के अंदर पारित नहीं होता है तो निरस्त कानून फिर से प्रभावी हो सकता है।

कानून मंत्रालय के पास भेजा जाता है प्रस्ताव

अगर संसद से पास किसी कानून को संसद के जरिए वापस लिया जाना है तो सबसे पहले संबंधित मंत्रालय द्वारा संसद में कानून वापसी से जुड़ा एक प्रस्ताव तैयार किया जाता है और उसे कानून मंत्रालय के पास भेजा जाता है। इसके बाद कानून मंत्रालय उस प्रस्ताव का अध्ययन करता है और उसके कानूनी वैधानिकता की जांच करता है। कानून मंत्रालय एक तरह से उस प्रस्ताव की स्क्रूटनी करता है और जरूरी होने पर उसमें कुछ जोड़-घटाव की सिफारिश भी कर सकता है। कानून मंत्रालय से क्लियरेंस मिलने के बाद संबंधित मंत्रालय कानून वापसी के ड्राफ्ट के आधार पर बिल तैयार करेगा और उसे संसद में पेश करेगा। इसके बाद संसद के दोनों सदनों में प्रस्तावित बिल पर चर्चा, बहस और वोटिंग कराने का प्रावधान है। अगर कानून वापसी के पक्ष में ज्यादा वोट पड़े तो सदन कानून वापसी का बिल पारित करेगा। एक ही बिल के जरिए तीनों कृषि कानून वापसी किया जा सकता है।

राजपत्र में होगा प्रकाशित
दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से कानून वापसी का बिल पारित होने के बाद उसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद उसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा। इस तरह कानून वापसी की प्रक्रिया पूरी होगी।


सुप्रीम कोर्ट के जरिए भी सरकार वापस ले सकती है कानून
कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला विचाराधीन है। सरकार अगर चाहे तो वैकल्पिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर भी इन कानूनों को रद्द करने के लिए अपनी सहमति दे सकती है। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक आदेश से भी कानून रद्द हो सकते हैं।